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69,000 शिक्षक भर्ती का सच: 5 हैरान करने वाली बातें जो हर किसी को जाननी चाहिए

Introduction: A Dream Deferred

भारत में एक सरकारी शिक्षक की नौकरी पाना लाखों युवाओं के लिए एक सपने जैसा है। यह सिर्फ़ एक पद नहीं, बल्कि स्थिरता, सम्मान और एक सुरक्षित भविष्य का प्रतीक है, जिसके लिए अभ्यर्थी सालों-साल कड़ी मेहनत और लगन से तैयारी करते हैं। लेकिन 69,000 शिक्षक भर्ती अभियान के हज़ारों उम्मीदवारों के लिए यह सपना एक अंतहीन इंतज़ार और संघर्ष में बदल गया है।

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उनकी लड़ाई अब सिर्फ़ किताबों और परीक्षा हॉलों तक सीमित नहीं रही, बल्कि न्याय की गुहार लगाते हुए सड़कों पर आ गई है। उनका लंबा इंतज़ार सिर्फ़ एक प्रशासनिक देरी नहीं, बल्कि एक व्यवस्थागत उपेक्षा की कहानी बन गया है। यह लेख उनके इसी संघर्ष से निकली पाँच ऐसी हैरान करने वाली और महत्वपूर्ण बातों को उजागर करेगा, जिन्हें हर किसी को जानना चाहिए।

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1. एक साल, 30 तारीखें, और एक भी सुनवाई नहीं

इस विरोध प्रदर्शन का सबसे चौंकाने वाला तथ्य न्याय प्रक्रिया में हो रही असाधारण देरी है। अभ्यर्थियों के अनुसार, यह मामला सुप्रीम कोर्ट में एक साल से भी ज़्यादा समय से लंबित है। इस दौरान, एक प्रदर्शनकारी के मुताबिक अदालत में सुनवाई के लिए 27 से 28 तारीखें मिल चुकी हैं, लेकिन किसी भी तारीख पर कोई ठोस सुनवाई नहीं हो पाई।

अभ्यर्थियों का मूल आरोप यह है कि सरकार, जिसने खुद हाईकोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील दायर की थी, अब इस मामले में कोई दिलचस्पी नहीं दिखा रही है। उनका दावा है कि सरकार का अपना वकील ही बहस के लिए अदालत में पेश नहीं हो रहा है, जिससे न्याय की प्रक्रिया पूरी तरह से रुकी हुई है। एक प्रदर्शनकारी का दर्द और हताशा इन शब्दों में साफ़ झलकती है:

“सर, एक साल से ज़्यादा हो गया… 27–28 तारीखें लग चुकी हैं, लेकिन सरकार का वकील कोर्ट में खड़ा ही नहीं हो रहा। हमारी सुनवाई नहीं हो रही…”

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2. सरकार की चुप्पी पर उठते सवाल

प्रदर्शनकारियों के लिए सरकार का रवैया समझ से परे है। वे इस बात से हैरान हैं कि जिस सरकार ने ख़ुद इस मामले को सुप्रीम कोर्ट तक पहुँचाया, वही अब इसकी पैरवी करने से क्यों पीछे हट रही है। यह स्थिति अभ्यर्थियों के मन में सरकार की मंशा को लेकर गहरे सवाल खड़े करती है।

उन्हें लगता है कि उनकी आवाज़ को जानबूझकर अनसुना किया जा रहा है और सरकार ने उनके भविष्य पर एक रहस्यमयी चुप्पी साध ली है। कुछ अभ्यर्थियों के लिए यह लड़ाई दो साल से चल रही है, जिसने उन्हें थका दिया है और सरकार की निष्क्रियता उनके ज़ख्मों पर नमक छिड़कने जैसा काम कर रही है। एक अन्य अभ्यर्थी अपनी पीड़ा व्यक्त करते हुए कहते हैं:

“हम दो-दो साल से कोर्ट में लड़ रहे हैं। 30-30 तारीखें लग गईं, लेकिन एक भी तारीख पर सुनवाई नहीं हुई। सरकार बिल्कुल मौन बैठी है।”

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3. सड़कों पर उतरी आवाज़, जिसे VVIP ज़ोन में दबा दिया गया

न्याय की उम्मीद में अमेठी, प्रयागराज, और लखनऊ जैसे कई ज़िलों से अभ्यर्थी राजधानी की सड़कों पर इकट्ठा हुए। उनका इरादा शांतिपूर्वक प्रदर्शन कर अपनी बात डिप्टी सीएम तक पहुँचाना था। लेकिन जैसे ही उन्होंने आगे बढ़ने की कोशिश की, पुलिस की भारी नाकाबंदी ने उनका रास्ता रोक दिया।

विडंबना यह थी कि उनकी शांतिपूर्ण आवाज़ को यह कहकर दबा दिया गया कि वह इलाका एक “VVIP ज़ोन” है और वहाँ किसी भी तरह के प्रदर्शन की अनुमति नहीं है। इस कार्रवाई ने प्रदर्शनकारियों को हैरान कर दिया, जिनकी सीधी सी मांग थी कि उन्हें अपनी बात रखने का हक़ मिले। एक अभ्यर्थी ने इस बेबसी को एक चुभते हुए सवाल में समेटा: “क्या चार लोग बैठकर अधिकार भी नहीं मांग सकते?” अंततः, सभी प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लेकर इको गार्डन भेज दिया गया, जिससे उनका सार्वजनिक विरोध प्रभावी रूप से समाप्त हो गया।

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4. यह सिर्फ़ नौकरी नहीं, आरक्षण और सम्मान की लड़ाई है

अगर इस प्रदर्शन को गहराई से देखें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि यह लड़ाई सिर्फ़ रोज़गार पाने तक सीमित नहीं है। यह सामाजिक न्याय और संवैधानिक आरक्षण के सम्मान की एक बड़ी लड़ाई का हिस्सा है। प्रदर्शनकारियों के हाथों में मौजूद पोस्टर इस भावना को साफ़ तौर पर व्यक्त करते हैं, जिन पर लिखा था: “ओबीसी-एससी आरक्षण पीड़ितों की यही पुकार – सुप्रीम कोर्ट में पैरवी कराए सरकार।”

उनके “आरक्षण का सम्मान करो” जैसे नारे इस बात का सबूत हैं कि वे इसे अपने संवैधानिक अधिकारों पर हमले के रूप में देखते हैं। इसके अलावा, बाबासाहेब डॉ. बी.आर. अंबेडकर की तस्वीरें लेकर प्रदर्शन करना इस संघर्ष को पिछड़े और दलित वर्गों के अधिकारों के लिए चल रहे एक ऐतिहासिक आंदोलन से जोड़ता है। यह केवल एक भर्ती का मामला नहीं, बल्कि पहचान और सम्मान की लड़ाई है।

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5. नेताओं को सीधी चेतावनी: “नौकरी दो या इस्तीफ़ा दो”

सालों के इंतज़ार, अनगिनत अदालती तारीख़ों और सरकारी उदासीनता ने अब अभ्यर्थियों के सब्र का बांध तोड़ दिया है। उनकी गुहार अब सीधी और कठोर चेतावनियों में बदल गई है। वे अब केवल अनुरोध नहीं कर रहे, बल्कि अपने राजनीतिक प्रतिनिधियों, विशेषकर अपने ही समुदाय से आने वाले नेताओं से जवाबदेही की मांग कर रहे हैं।

उनका मोहभंग और गुस्सा इस एक बयान में चरम पर पहुँच जाता है, जो पूरे राजनीतिक तंत्र के लिए एक खुली चुनौती है। यह बयान उनकी निराशा की गहराई और अब समझौता न करने के उनके दृढ़ संकल्प को दर्शाता है:

“पिछड़े-दलित समाज के जो भी नेता हैं, या तो हमारी नौकरी दिलवाएं या फिर इस्तीफा दें। अब चेहरा उजागर हो चुका है।”

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Conclusion: इंतज़ार की आग और एक अनसुलझा सवाल

69,000 शिक्षक भर्ती के ये अभ्यर्थी आज अदालती तारीख़ों, सड़क के विरोध प्रदर्शनों और एक अनिश्चित भविष्य के चक्र में फँसे हुए हैं। उनकी कहानी सिर्फ़ कुछ हज़ार नौकरियों की नहीं, बल्कि न्याय, जवाबदेही और एक ऐसी व्यवस्था पर विश्वास की है, जो अपने ही नागरिकों की आवाज़ सुनने में विफल होती दिख रही है।

व्यवस्थागत विफलता और आधिकारिक चुप्पी से चिह्नित यह पूरा संघर्ष, एक ही चुभते हुए और अनसुलझे सवाल पर आकर खत्म होता है:

सबसे बड़ा सवाल यही है—जब मामला सुप्रीम कोर्ट में है, तो सरकार समय पर पैरवी क्यों नहीं कर रही? और कब तक 69,000 शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थी इसी तरह तारीख़ों और इंतज़ार की आग में झुलसते रहेंगे?


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