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2011 यूपीटेट (UPTET) भर्ती: 14 साल का लंबा इंतज़ार और आंकड़ों का चौंकाने वाला सच

1. प्रस्तावना

72825 Shikshak bharti Google Form update_उत्तर प्रदेश शिक्षक पात्रता परीक्षा (UPTET) 2011 की भर्ती आज महज़ एक कानूनी प्रक्रिया नहीं, बल्कि हज़ारों अभ्यर्थियों के लिए एक ‘दशक से अधिक का मानसिक और आर्थिक वनवास’ बन चुकी है। 14 साल का यह लंबा कालखंड किसी भी व्यक्ति के धैर्य की अंतिम सीमा हो सकता है। प्रशासनिक शिथिलता और कानूनी दांव-पेचों के बीच फंसे ये अभ्यर्थी आज भी इस उम्मीद में हैं कि उनकी तपस्या का एक न्यायपूर्ण अंत होगा। वरिष्ठ शिक्षा विश्लेषक के रूप में, मैं इस प्रकरण को केवल एक ‘भर्ती’ के रूप में नहीं, बल्कि एक गंभीर ‘मानवीय दृष्टिकोण’ से देखती हूँ। आज जब हम इन आंकड़ों का विश्लेषण करते हैं, तो एक चौंकाने वाली तस्वीर सामने आती है जो इस जटिल समस्या के सरल समाधान की ओर इशारा करती है। आखिर इतने वर्षों बाद वास्तविक अभ्यर्थियों की संख्या क्या है? आइए, तथ्यों के धरातल पर इस गणित को समझते हैं।

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2. 2.15 लाख से 35,000 तक का सफ़र: आंकड़ों का विश्लेषण

अक्सर यह तर्क दिया जाता है कि अभ्यर्थियों की संख्या बहुत अधिक है, जिससे समायोजन कठिन है। लेकिन यदि हम स्रोत सामग्री के आधार पर गहराई से विश्लेषण करें, तो वास्तविकता इसके विपरीत है:

  • प्रारंभिक आधार (2011): वर्ष 2011 में यूपीटेट उत्तीर्ण करने वाले कुल अभ्यर्थियों की संख्या लगभग 2,15,000 थी।
  • अन्य क्षेत्रों में समायोजन (14 वर्षों का प्रभाव): इन 14 वर्षों के लंबे अंतराल में, लगभग 1,00,000 (एक लाख) अभ्यर्थी रेलवे, पुलिस, टीजीटी-पीजीटी (TGT/PGT), केंद्र सरकार की नौकरियों और बिहार जैसे अन्य राज्यों की शिक्षक भर्तियों में नियुक्त होकर व्यवस्थित हो चुके हैं।
  • पूर्व की नियुक्तियां: पूर्व में हुई 66,000 नियुक्तियों के आंकड़े को घटाने के बाद, अब शेष बचे अभ्यर्थियों की संख्या लगभग 45,000 रह जाती है।
  • सूचना का अभाव और अन्य कारण: इन 45,000 में से भी कम से कम 10,000 अभ्यर्थी ऐसे हैं जो या तो विदेश जा चुके हैं, गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं या जिन्हें वर्तमान प्रक्रिया की जानकारी ही नहीं है। आज भी कई अभ्यर्थी पूछते हैं, “सर, गूगल फॉर्म कब आएगा?”, जो इस ‘इंफॉर्मेशन गैप’ को दर्शाता है।
  • त्रुटिपूर्ण आवेदन: गूगल फॉर्म भरने के दौरान भी लगभग 500 से 1000 फॉर्म गलत भरे जाने की संभावना बनी रहती है।
  • अंतिम वास्तविक डेटा: इस प्रकार, सभी पहलुओं को छानने के बाद, जो ‘फाइनल और मजबूत डेटा’ उभरकर सामने आता है, वह मात्र 30,000 से 35,000 अभ्यर्थियों का है।

विश्लेषक की टिप्पणी: संख्या का 2.15 लाख से घटकर मात्र 35,000 के आसपास सिमट जाना, सरकार के लिए इस भर्ती को पूर्ण करने का सबसे बड़ा अवसर है। प्रशासनिक दृष्टिकोण से इतने कम अभ्यर्थियों का समायोजन न केवल व्यावहारिक है, बल्कि वित्तीय रूप से भी राज्य पर कोई बड़ा बोझ नहीं डालता।

3. क्या आपका Google Form रिजेक्ट हो जाएगा? एक व्यावहारिक राहत

अभ्यर्थियों के मन में यह गहरा भय है कि 14 साल पुराने दस्तावेजों के अभाव में उनका आवेदन निरस्त हो जाएगा। लेकिन यहाँ नोडल अधिकारियों का ‘प्रैक्टिकल अप्रोच’ एक बड़ी राहत लेकर आया है। अधिकारियों ने इस कड़वी सच्चाई को स्वीकार किया है कि एक दशक पुराने मामले में अभ्यर्थियों के पास रोल नंबर, सीरियल नंबर या आईडी नंबर सुरक्षित होना कठिन है।

इसी मानवीय आधार पर, नोडल अधिकारियों ने निम्नलिखित व्यवस्था की है:

  • गैर-अनिवार्य कॉलम (Non-Mandatory): फॉर्म में रोल नंबर, सीरियल नंबर और आईडी नंबर जैसे कॉलम को अनिवार्य (Mandatory) नहीं रखा गया है।
  • अनिवार्य विवरण (Mandatory): केवल नाम, पिता का नाम, ईमेल, मोबाइल नंबर, टीईटी (TET) रोल नंबर और अंक जैसे बुनियादी विवरण ही मांगे गए हैं।

यदि इन मूलभूत जानकारियों में कोई बड़ी त्रुटि नहीं है, तो रिजेक्शन की कोई संभावना नहीं बनती। नोडल अधिकारियों और न्यायपालिका के इस उदारवादी रवैये को हम इस उद्धरण से समझ सकते हैं:

“नोडल अधिकारी और माननीय जज साहब बच्चों के भविष्य के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। यह संघर्ष अपने लिए नहीं, बल्कि आप सबके भविष्य को सुरक्षित करने के लिए किया जा रहा है।”

4. 45 की उम्र और ‘रास्ता खुलने’ की महत्ता

आज इस भर्ती की प्रतीक्षा कर रहे अभ्यर्थियों की औसत आयु 45 वर्ष के आसपास पहुँच चुकी है। जीवन के इस उत्तरार्ध में, अब अभ्यर्थियों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा, द्वेष, ईर्ष्या या नफरत के लिए कोई स्थान नहीं बचा है। उनकी मांग अब केवल रोजगार की सुरक्षा और एक सम्मानजनक जीवन की है।

यहाँ महत्वपूर्ण यह नहीं है कि पहली सूची 6,000, 14,000 या 16,000 की आती है। सबसे महत्वपूर्ण रणनीतिक लक्ष्य है—‘भर्ती का रास्ता खुलना’। एक बार यदि नियुक्ति की प्रक्रिया की नींव रख दी गई, तो शेष बचे हुए 15-20 हज़ार अभ्यर्थियों का भविष्य भी स्वतः ही सुरक्षित होने की राह पर चल पड़ेगा। प्राथमिकता इस बात की होनी चाहिए कि प्रक्रिया किसी भी तरह शुरू हो, ताकि इस लंबे संघर्ष को विराम मिल सके।

5. निष्कर्ष: एक न्यायपूर्ण अंजाम की प्रतीक्षा

यूपीटेट 2011 का मामला अब अपने अंतिम और निर्णायक मोड़ पर खड़ा है। आंकड़ों की कमी और नोडल अधिकारियों का सकारात्मक रुख यह स्पष्ट करता है कि समाधान अब बहुत करीब है। मैं राज्य सरकार और माननीय न्यायालय से विनम्र अपील करती हूँ कि इस लंबे मानवीय संघर्ष को एक सकारात्मक और सुखद अंजाम तक पहुँचाया जाए। अभ्यर्थियों ने 14 वर्षों तक जो अद्वितीय धैर्य दिखाया है, वह लोकतंत्र में न्याय की उम्मीद का सबसे बड़ा प्रमाण है।

अंतिम विचार: क्या शासन और प्रशासन की इच्छाशक्ति अब इस 14 साल के लंबे संघर्ष को एक न्यायपूर्ण और सुखद अंत की ओर ले जाएगी? इसका उत्तर आने वाला समय ही देगा, पर उम्मीद अब पहले से कहीं अधिक प्रबल है।


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