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72825 शिक्षक भर्ती: सुप्रीम कोर्ट का वो फैसला जो बदल सकता है हजारों युवाओं की किस्मत

उत्तर प्रदेश के शैक्षिक और विधिक गलियारों में 72825 shikshak Bharti latest news को लेकर एक बार फिर हलचल तीव्र है। वर्ष 2011 से न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हजारों अभ्यर्थियों के लिए संघर्ष का यह 14वां वर्ष निर्णायक सिद्ध हो सकता है। यह मामला केवल रिक्तियों का नहीं, बल्कि उन योग्य अभ्यर्थियों की ‘संवैधानिक मर्यादा’ का है, जो विधिक विसंगतियों के कारण एक दशक से अधिक समय से न्याय की बाट जोह रहे हैं।

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कट-ऑफ की विसंगति – योग्य अभ्यर्थी बाहर, कम अंक वाले अंदर?

इस पूरी भर्ती प्रक्रिया की सबसे बड़ी विडंबना चयन मानदंडों में रही ‘विधिक विसंगति’ है। एक वरिष्ठ विश्लेषण के आधार पर देखें तो चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता का घोर अभाव रहा, जहाँ उच्च कट-ऑफ वाले योग्य अभ्यर्थियों को चयन प्रक्रिया से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, वहीं अपेक्षाकृत कम अंक वाले अभ्यर्थी आज परिषदीय विद्यालयों में अपनी सेवाएँ दे रहे हैं। इसी बुनियादी अन्याय और विसंगति ने इस प्रकरण को देश की सर्वोच्च अदालत की दहलीज तक पहुँचाया है।

“विगत 14 वर्षों से हमारा जीवन केवल न्यायालय की तारीखों और सरकारी आश्वासनों के बीच पिस रहा है। यह संघर्ष केवल एक रोजगार का नहीं, बल्कि भर्ती प्रक्रिया में पारदर्शिता और योग्यता के सम्मान की पुनर्स्थापना का है।”

16,417 याचियों की सूची और Google Form का सच

वर्तमान में अभ्यर्थियों के मध्य दो अलग-अलग सूचियों को लेकर संशय की स्थिति व्याप्त है, जिसे विधिक दृष्टिकोण से समझना अनिवार्य है। यहाँ ‘याची’ (Petitioner) और ‘आवेदक’ (Applicant) के सूक्ष्म अंतर को स्पष्ट करना आवश्यक है:

  • 16,417 याचियों की सूची: यह उन अभ्यर्थियों का समूह है जो 25 जुलाई 2017 की निर्धारित समय-सीमा से पूर्व विधिक रूप से ‘याची’ बन चुके थे। सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशानुसार, यह सूची पहले ही राज्य सरकार को सौंपी जा चुकी है और वर्तमान विधिक कार्यवाही का प्राथमिक केंद्र यही सूची है।
  • गूगल फॉर्म (Google Form) आवेदक: 11 से 14 फरवरी 2026 के मध्य संकलित किए गए इन 30,000 से अधिक आवेदनों की एक पृथक सूची तैयार की जाएगी।

स्पष्ट रहे कि न्यायालय की प्राथमिकता और सरकार से माँगा गया स्पष्टीकरण वर्तमान में केवल उन 16,417 मूल याचियों तक सीमित है, जिनका डेटा विभाग को पहले ही प्राप्त हो चुका है।

रिक्त पदों का चौंकाने वाला आंकड़ा (46,944 बनाम 5,856)

बेसिक शिक्षा विभाग की ‘प्रशासकीय शिथिलता’ का अनुमान विभाग द्वारा प्रस्तुत विरोधाभासी आंकड़ों से लगाया जा सकता है। जहाँ एक ओर विभाग अक्सर नई नियुक्तियों के लिए पदों की न्यूनता का तर्क देता है, वहीं वास्तविक डेटा एक भिन्न तस्वीर प्रस्तुत करता है:

  • उत्तर प्रदेश में वर्तमान में शिक्षकों के कुल 46,944 पद रिक्त हैं।
  • तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो वर्ष 2022 से 2026 के मध्य मात्र 5,856 नियुक्तियाँ ही संपन्न हुई हैं।

रिक्त पदों की यह चिंताजनक खाई सरकार के उन दावों पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करती है जिनमें पदों की अनुपलब्धता की बात कही जाती है। जब रिक्तियों का आंकड़ा इतना विशाल है, तो योग्य अभ्यर्थियों को इतने वर्षों तक नियुक्ति से वंचित रखना न केवल अन्यायपूर्ण है बल्कि विभाग की कार्यशैली पर भी सवाल उठाता है।

19 फरवरी 2026 – एक निर्णायक तारीख

आगामी 19 फरवरी 2026 की तिथि इस दीर्घकालिक विधिक संघर्ष में एक ‘मील का पत्थर’ सिद्ध हो सकती है। 10 फरवरी 2026 को हुई पिछली सुनवाई इस आगामी सुनवाई का मुख्य उत्प्रेरक बनी, जिसमें माननीय न्यायालय ने सरकार के ढुलमुल रवैये पर कड़ा रुख अपनाते हुए अपना ‘स्टैंड’ स्पष्ट करने का अंतिम अवसर दिया था। न्यायालय ने स्पष्ट पूछा है कि इन 16,417 अभ्यर्थियों के समायोजन हेतु सरकार की क्या ठोस नीति है।

इस सुनवाई की गंभीरता का प्रमाण यह है कि इसमें प्रमुख सचिव (बेसिक शिक्षा) और विभाग के अन्य शीर्ष अधिकारियों को व्यक्तिगत रूप से उपस्थित रहने का निर्देश है। दोपहर लगभग 2 बजे होने वाली यह कार्यवाही संकेत दे रही है कि सरकार अब इस पुराने विवाद के स्थायी समाधान हेतु कोई विधिक प्रस्ताव न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकती है।

निष्कर्ष: क्या न्याय की घड़ी करीब है?

72825 शिक्षक भर्ती का यह प्रकरण अब उस मुकाम पर है जहाँ वर्षों का धैर्य और संघर्ष एक निर्णायक परिणाम की ओर बढ़ रहा है। यदि 19 फरवरी को न्यायालय 16,417 याचियों के पक्ष में कोई युक्तिसंगत और ऐतिहासिक निर्णय देता है, तो यह न केवल उन अभ्यर्थियों की जीत होगी बल्कि उत्तर प्रदेश के शैक्षिक ढांचे में विश्वास बहाली का एक माध्यम भी बनेगा।

72825 shikshak Bharti latest news पर पैनी नजर रखने वाले विशेषज्ञों का मानना है कि उपलब्ध रिक्तियों की संख्या को देखते हुए अभ्यर्थियों का समायोजन एक ‘सकारात्मक संभावना’ है। क्या उत्तर प्रदेश सरकार अब पारदर्शिता के साथ इस पुराने विधिक घाव को भरने का साहस जुटा पाएगी? भविष्य की भर्तियों में पारदर्शिता सुनिश्चित करने हेतु यह फैसला एक नजीर साबित होगा।


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