8th Pay Commission आज हमारे साथ हैं देश के पूर्व वित्त सचिव सुभाष चंद्र गर्ग जी! उनकी नई किताब ‘No Minister: Navigating Power Politics and Bureaucracy with Steely Resolve’ ने खूब सुर्खियां बटोरी हैं। आज की राजनीति, वेतन आयोग की देरी, पेंशन योजनाओं का झगड़ा, नौकरियों का संकट और अर्थव्यवस्था पर गर्मागर्म बहस… यहां जानें सुभाष जी के साथ Exclusive बातचीत के मुख्य अंश!”
किताब का राज: ‘No Minister’ का मतलब क्या?
सुभाष जी की किताब ‘No Minister’ का टाइटल ही चौंकाने वाला है। रजत देवगन ने सवाल किया: “क्या इसका मतलब है कि आईएएस अफसरों को मंत्रियों को ‘ना’ कहना पड़ता है?” सुभाष जी ने जवाब दिया: “एक आईएएस अफसर के करियर (35-40 साल) में कई मौके आते हैं जब उसे फैसला करना होता है: जनहित क्या चाहता है? अगर कोई मंत्री कुछ गलत करने को कहें, तो उसे मना करना ही पड़ता है।” उन्होंने बताया कि शुरुआती 10-15 साल (फील्ड पोस्टिंग) में कानून-योजनाओं के प्रावधानों का हवाला देकर मना करना आसान होता है। बाद के सालों (नीति निर्माण) में बेहतर विकल्प पेश करके समझाना ज़रूरी होता है।
वेतन आयोग पर बड़ा खुलासा: क्या सरकार देगी ‘Pay Package’?
सातवें वेतन आयोग (7th Pay Commission) की घोषणा होने के बावजूद, उसका गठन नहीं हुआ है। सुभाष जी ने चौंकाने वाला अनुमान जताया: “सरकार शायद वेतन आयोग बनाए बिना ही कोई ‘पे पैकेज’ (Pay Package) देने की सोच रही है!” उन्होंने इसकी वजह बताई: जनवरी 2024 में दिल्ली चुनाव से पहले अश्विनी वैष्णव के ट्वीट के बाद भी कैबिनेट का कोई औपचारिक फैसला या वेतन आयोग का गठन नहीं हुआ। उनका मानना है कि अब 1 जनवरी 2026 तक आयोग बनना भी मुश्किल लगता है।
OPS vs NPS: पेंशन का युद्ध किसके हक में?
पुरानी पेंशन योजना (OPS) बनाम नई पेंशन योजना (NPS) पर जबरदस्त बहस छिड़ी है। सुभाष जी साफ कहते हैं: “OPS को वापस लाना बिल्कुल ग़लत और गैर-ज़िम्मेदाराना कदम होगा।” उन्होंने याद दिलाया कि 2004 के बाद आए कर्मचारियों को नई शर्तें पता थीं। केंद्र सरकार का यूपीएस (Unified Pension Scheme) भी कर्मचारियों को पसंद नहीं आया, क्योंकि वे सिर्फ पूरी OPS ही चाहते हैं। सुभाष जी मानते हैं कि NPS एक सफल और अच्छी योजना थी, राजनीतिक दबाव में उसे बदलना ठीक नहीं।
सरकारी नौकरियों का सच: क्यों नहीं भर रहीं Vacancies?
सरकार पर ‘नौकरियां नहीं देने’ के आरोपों पर सुभाष जी ने स्पष्ट किया: “सरकार में अब ज्यादा नौकरियां बनाने की न तो ज़रूरत है, न ही समझदारी।” उन्होंने प्रधानमंत्री के ’10 लाख नौकरियों’ के वादे का ज़िक्र करते हुए बताया कि ज़्यादातर खाली पद रेलवे या डाक विभाग जैसी जगहों के थे, जिनकी अब उतनी ज़रूरत नहीं। उनका सुझाव: रोज़गार प्राइवेट सेक्टर, डिजिटल और सर्विस इंडस्ट्री में पैदा करने पर ध्यान देना चाहिए।
सरकारी vs प्राइवेट नौकरी: किसकी Salary बेहतर?
सरकारी और प्राइवेट नौकरी की तुलना पर सुभाष जी ने दिलचस्प तथ्य रखे: “सरकारी नौकरी में निचले स्तर (क्लास III/IV) पर सैलरी, सुरक्षा और पेंशन प्राइवेट सेक्टर से कहीं बेहतर है। लेकिन टॉप लेवल (जैसे SBI चेयरमैन) पर प्राइवेट सेक्टर सैलरी 10-15 गुना तक ज़्यादा हो सकती है!” उन्होंने कहा कि सरकारी कर्मचारियों की सैलरी बढ़ने से प्राइवेट सेक्टर उसकी बराबरी नहीं कर पाएगा।
Indus Water Treaty: भारत ने क्यों खींचा हाथ?
सुभाष जी ने वर्ल्ड बैंक में भारत के कार्यकारी निदेशक रहते हुए सिंधु जल समझौते (Indus Water Treaty) पर हुए विवाद को याद किया। 2016 में किशनगंगा और रातले पनबिजली परियोजनाओं को लेकर पाकिस्तान ने विवाद खड़ा किया था। सुभाष जी ने बताया कि कैसे उन्होंने तत्कालीन विदेश सचिव एस जयशंकर के साथ मिलकर वर्ल्ड बैंक में ट्रिब्यूनल बनने से रोका था। हालांकि, 2022 में भारत ने ट्रिब्यूनल से खुद को अस्थायी रूप से अलग कर लिया। सुभाष जी मानते हैं कि 1960 के इस समझौते पर अब पुनर्विचार ज़रूरी है।
चुनाव आयोग पर सवाल: क्या दबाव में काम कर रहा है?
संस्थाओं पर राजनीतिक दबाव के सवाल पर सुभाष जी ने स्पष्ट राय रखी: “मज़बूत प्रधानमंत्री के समय में संस्थाओं पर क़ब्ज़ा या दबाव बढ़ने की प्रवृत्ति रही है, चाहे इंदिरा गांधी का दौर हो या मोदी का।” उन्होंने चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले चुनावों में प्रधानमंत्री के बयानों पर कार्रवाई न करना इसका उदाहरण है। उनका स्पष्ट संदेश: “अफसरों को ‘No Minister’ की तरह काम करना आना चाहिए।”
‘Dead Economy’ पर सुभाष जी का झटका: “बेबुनियाद बयान!”
राहुल गांधी और डोनाल्ड ट्रंप के ‘डेड इकॉनॉमी’ बयान पर सुभाष जी ने सख्त प्रतिक्रिया दी: “यह बिल्कुल बेबुनियाद और गैर-ज़िम्मेदाराना बयान है। अर्थव्यवस्था बढ़ रही है, लेकिन दो बड़ी चिंताएं हैं: प्रति व्यक्ति आय में खास बढ़ोतरी नहीं हुई और आय असमानता (Inequality) बढ़ी है।” उन्होंने माना कि किसानों और मज़दूरों की हालत में बड़ा सुधार नहीं आया है।
नोटबंदी का राज: क्या मिला फर्जी नोटों का सबूत?
2019 में ‘फर्जी करेंसी नोटों’ की जांच की ज़िम्मेदारी सुभाष जी को दी गई थी। उन्होंने खुलासा किया: “हमने पेपर खपत और नोट छपाई का बारीकी से मिलान किया। लगभग 96-97% हिसाब मिल गया। बाकी 3-3.5% प्राकृतिक बर्बादी (Wastage) के दायरे में आता है। ऐसा कोई सबूत नहीं मिला कि ऊपर से नोट छापे गए।” उन्होंने बताया कि पीएमओ संतुष्ट नहीं था और विवेक देवराय की कमेटी बनी, लेकिन तब तक उनका तबादला हो गया था।
क्या 500 के नोट भी होंगे बंद? सुभाष जी का साफ जवाब
500 रुपये के नोट बंद होने की अफवाहों पर सुभाष जी ने कहा: “इसका कोई तुक नहीं है! ₹500 का नोट महज 6 डॉलर के बराबर है। यह देश की 90% करेंसी का आधार है। इसे बंद करना पूरे भुगतान तंत्र को ढहा देगा। कैश में ब्लैक मनी का विचार ही सतही है।” उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि डिजिटल पेमेंट बढ़ने के बावजूद देश में करेंसी की मांग बढ़ रही है।
सुभाष चंद्र गर्ग की किताब ‘No Minister’ में ऐसे कई और चौंकाने वाले खुलासे और व्यक्तिगत अनुभव हैं। क्या आप पढ़ेंगे ये किताब? कमेंट में बताएं!
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लेखक परिचय – चंद्रशेखर
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चंद्रशेखर
(M.Sc Maths, B. Sc, B.Ed, TGT Qualified 2016, UPTET Qualified)