सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला! अब SC-ST में ‘कोटे के अंदर कोटा’ — राजनीति में भूचाल | Sub Categorization Explained”

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Table of Contents

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1. Introduction – सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला


आज हम बात करने जा रहे हैं सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले की जिसने पूरे देश में एक नई बहस को जन्म दे दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने 20 साल पुराने फैसले को पलटते हुए कहा है कि अब SC और ST के अंदर सब-कैटेगराइजेशन यानी कोटे के अंदर कोटा बनाया जा सकता है।
यह फैसला भारत की सामाजिक और राजनीतिक दिशा दोनों को बदलने वाला है।


2. Background – 2004 का फैसला और अब का बदलाव

2004 में सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की बेंच ने EV Chinnaiah बनाम आंध्र प्रदेश केस में कहा था कि
SC और ST के अंदर किसी तरह का सब-क्लासिफिकेशन या सब-कैटेगराइजेशन नहीं किया जा सकता।
लेकिन अब, 2024 में सात जजों की बेंच ने इस फैसले को पलट दिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा –
राज्य सरकारें अब अनुसूचित जाति और जनजाति के अंदर सब-कैटेगरी बना सकती हैं, ताकि जो जातियां सच में पीछे रह गई हैं उन्हें आरक्षण का असली लाभ मिल सके।


3. क्या है सब-कैटेगराइजेशन (Sub-Categorization)?

अब सवाल उठता है कि सब-कैटेगराइजेशन आखिर होता क्या है?
मान लीजिए कि किसी राज्य में SC के लिए 15% आरक्षण है और उस 15% में 39 जातियां शामिल हैं।
अब राज्य सरकार यह तय कर सकती है कि उन 39 में से कौन सी जाति को कितना प्रतिशत लाभ मिले।
जैसे –
कुछ अत्यधिक पिछड़ी जातियों को ज्यादा लाभ और जो पहले से मजबूत हैं उन्हें थोड़ा कम लाभ।
इसका मतलब है कि अब हर राज्य अपनी सामाजिक स्थिति के अनुसार आरक्षण का बंटवारा तय करेगा।


4. सुप्रीम कोर्ट के फैसले की मुख्य बातें

  1. किसी एक जाति को 100% आरक्षण नहीं दिया जा सकता।
  2. सब-कैटेगराइजेशन करने से पहले राज्य को विश्वसनीय डेटा और प्रमाण जुटाने होंगे।
  3. यह फैसला न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) के दायरे में रहेगा।
  4. सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला 6-1 के बहुमत से सुनाया।
  5. जस्टिस बी.एम. त्रिवेदी ने इस फैसले का विरोध किया और कहा कि यह अनुच्छेद 341 के खिलाफ है।

5. संविधान के अनुच्छेद 341 और 142 का मामला

अनुच्छेद 341 कहता है कि यह राष्ट्रपति का अधिकार है कि वो तय करें कि कौन सी जातियां SC मानी जाएंगी।
लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अब अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्ति का उपयोग करते हुए यह अधिकार राज्यों को दे दिया है।
यही वजह है कि इस फैसले को Judicial Activism यानी न्यायिक सक्रियता का उदाहरण भी कहा जा रहा है।


6. पंजाब केस – सब-कैटेगराइजेशन की जड़

इस पूरे मामले की शुरुआत पंजाब से हुई।
1975 में पंजाब सरकार ने वाल्मीकि और मजहबी सिखों के लिए SC कोटे के अंदर अलग आरक्षण तय किया।
यह नीति 30 साल तक चली, लेकिन 2004 में EV Chinnaiah केस के बाद इसे रद्द कर दिया गया।
पंजाब सरकार ने फिर 2006 में नया कानून बनाया और यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया।
14 साल की लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने पंजाब की इस मांग को सही ठहराया है।


7. इंदिरा साहनी केस और क्रीमी लेयर का संदर्भ

1992 में सुप्रीम कोर्ट ने इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ केस में कहा था कि
OBC के अंदर क्रीमी लेयर और नॉन-क्रीमी लेयर बनाई जा सकती है।
अब उसी आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने माना कि SC/ST के अंदर भी सब-कैटेगरी बनाना असमानता के खिलाफ नहीं है।
बल्कि इससे समान अवसर और प्रतिनिधित्व को बढ़ावा मिलेगा।


8. राजनीति पर असर

अब इस फैसले के राजनीतिक मायने सबसे गहरे हैं।
भारत के लगभग 17 राज्य ऐसे हैं जहां जातिगत समीकरण राजनीति की दिशा तय करते हैं।
अब जब राज्य सरकारों को यह अधिकार मिल गया है कि वे SC/ST के अंदर सब-कैटेगरी बना सकें,
तो आने वाले चुनावों में नई जातिगत रणनीतियाँ देखने को मिलेंगी।

उदाहरण के तौर पर –
उत्तर प्रदेश में PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) जैसी राजनीति चल रही थी।
अब दलित वर्ग के अंदर ही वर्गीकरण होने से वोट बैंक और ज्यादा विभाजित (Fragmented) होंगे।
यानी अब राजनीति में “फूट डालो और राज करो” जैसी स्थिति देखने को मिल सकती है।


9. आरक्षण व्यवस्था की वर्तमान स्थिति

भारत में कुल आरक्षण लगभग 59.5% है –

  • SC: 15%
  • ST: 7.5%
  • OBC: 27%
  • EWS: 10%
    बाकी 40.5% सीटें अनारक्षित वर्ग के लिए हैं।
    इस फैसले के बाद राज्यों के स्तर पर यह प्रतिशत वितरण विभिन्न जातियों के आधार पर और भी बदल सकता है।

10. आगे क्या होगा?

अब यह राज्यों पर निर्भर करेगा कि वे इस फैसले को कैसे लागू करते हैं।
कुछ राज्य डेटा इकट्ठा कर नए कोटे बना सकते हैं।
कई जगह यह फैसला नई कानूनी लड़ाइयों को भी जन्म देगा।
हर राज्य की नीति पर Supreme Court में Review Petitions आने की संभावना है।
यानि यह फैसला आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति, समाज और न्यायपालिका – तीनों पर असर डालेगा।


11. निष्कर्ष (Conclusion)

तो दोस्तों, सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला केवल एक न्यायिक निर्णय नहीं है,
बल्कि यह भारत के सामाजिक न्याय और प्रतिनिधित्व के नए युग की शुरुआत है।
अब देखना यह होगा कि राज्य सरकारें इस फैसले का उपयोग समानता लाने के लिए करती हैं या राजनीति के लिए।

अगर आप सिविल सेवा, लॉ या पॉलिटिकल साइंस के विद्यार्थी हैं,
तो यह मामला आपके लिए एक महत्वपूर्ण केस स्टडी है।
EV Chinnaiah vs State of Andhra Pradesh (2004) और
State of Punjab vs Davinder Singh (2024) — दोनों केस जरूर पढ़ें।


12. Call to Action

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आप अपनी राय नीचे Comment Box में जरूर बताएं –
क्या सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला सामाजिक समानता को बढ़ावा देगा या राजनीति को और जटिल बनाएगा?

धन्यवाद।
जय हिंद।



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