TGT-PGT 2022 भर्ती: रद्द या परीक्षा? 3 साल के इंतज़ार के 4 चौंकाने वाले सच

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TGT-PGT 2022 भर्ती: रद्द या परीक्षा? 3 साल के इंतज़ार के 4 चौंकाने वाले सच

किसी महत्वपूर्ण परीक्षा का इंतज़ार करना हमेशा ही तनावपूर्ण होता है, लेकिन जब यह इंतज़ार तीन साल लंबा हो जाए और हज़ारों छात्रों का भविष्य दांव पर लगा हो, तो स्थिति एक गंभीर संकट का रूप ले लेती है। उत्तर प्रदेश में TGT-PGT 2022 भर्ती का मामला ठीक यही है। तीन साल से परीक्षा की तारीख का इंतज़ार कर रहे छात्र अब दो गुटों में बंट गए हैं। एक पक्ष इस भर्ती को रद्द कर सभी पदों को जोड़कर एक बड़ी भर्ती कराने की मांग कर रहा है, तो दूसरा पक्ष तत्काल परीक्षा आयोजित कराने पर अड़ा है। यह लेख इस बहस के उन चार चौंकाने वाले सच का विश्लेषण करेगा जो दिखाते हैं कि असली मुद्दा ‘रद्द’ या ‘परीक्षा’ नहीं, बल्कि सिस्टम द्वारा पैदा की गई ‘अनिश्चितता’ है।

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1. पहला सच: ‘सब कुछ रद्द करो, एक बड़ी भर्ती कराओ’ — एक हैरान करने वाला प्रस्ताव

एक तरफ कुछ छात्र और संगठन यह मांग कर रहे हैं कि 2022 की TGT-PGT और असिस्टेंट प्रोफेसर भर्ती को पूरी तरह से रद्द कर दिया जाए। इस पक्ष का तर्क प्रशासनिक दक्षता पर केंद्रित है, जिसका मानना है कि एक समेकित प्रक्रिया से न केवल समय और संसाधनों की बचत होगी, बल्कि स्कूलों और कॉलेजों में शिक्षकों के हजारों खाली पदों को शीघ्रता से भरा जा सकेगा।

उनकी मुख्य मांगें इस प्रकार हैं:

  • ✔ TGT–PGT 2022 को रद्द किया जाए
  • ✔ सभी रिक्त पद जोड़कर एक बड़ी भर्ती लाई जाए
  • ✔ पुरानी नियमावली से भर्ती हो
  • ✔ सभी अभ्यर्थियों को दोबारा आवेदन का मौका मिले

पुरानी नियमावली की मांग यह दर्शाती है कि अभ्यर्थी भर्ती प्रक्रिया में किसी भी नए या संभावित प्रतिकूल नियम से बचना चाहते हैं। इस प्रस्ताव को आकर्षक बनाने के लिए एक ठोस टाइमलाइन भी पेश की गई है: “फरवरी-मार्च में फॉर्म, अप्रैल-मई में परीक्षा, और जुलाई तक नियुक्ति।” यह त्वरित समाधान का वादा पहली नज़र में तार्किक लगता है।

यह तार्किक लगने वाला प्रस्ताव उन हज़ारों छात्रों के लिए एक बड़ा झटका क्यों है? इसका जवाब उनके तीन साल के लंबे और थका देने वाले संघर्ष में छिपा है।

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2. दूसरा सच: ‘हमारी मेहनत बर्बाद हो जाएगी’ — छात्रों का 3 साल का संघर्ष

भर्ती रद्द करने के प्रस्ताव का कड़ा विरोध वे छात्र कर रहे हैं जिन्होंने पिछले तीन साल इसी एक परीक्षा की तैयारी में लगाए हैं। उनके लिए यह केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि उनकी मेहनत, समय और संसाधनों की पूर्ण बर्बादी है। उनकी मुख्य चिंता यह है कि अगर भर्ती रद्द होती है तो उनका मानसिक और आर्थिक नुकसान होगा जिसकी भरपाई नहीं हो सकती।

उनकी भावनाओं को इस एक वाक्य में समझा जा सकता है:

हम नहीं चाहते कि पुरानी भर्ती की बलि देकर नई भर्ती का रास्ता बनाया जाए।

यह पक्ष मांग कर रहा है कि सरकार पहले 2022 की भर्ती प्रक्रिया को पूरा करे और उसके बाद ही कोई नई भर्ती लाए। उनका तर्क एक गहरे सवाल को जन्म देता है: “अगर हर भर्ती को ‘देरी हो गई, इसलिए रद्द कर दो’ कहकर खत्म किया जाएगा तो छात्र सिस्टम पर भरोसा कैसे करेंगे?” यह केवल एक भर्ती का मामला नहीं, बल्कि एक व्यवस्थागत समस्या का प्रतिबिंब है, जहाँ प्रशासनिक अकर्मण्यता का खामियाजा अंततः अभ्यर्थी को भुगतना पड़ता है।

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3. तीसरा सच: मौखिक आश्वासन और व्यवस्था पर भरोसे का संकट

इस पूरी बहस के बीच एक महत्वपूर्ण वास्तविकता यह है कि भर्ती रद्द होने की कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है। यह केवल कुछ छात्र संगठनों की मांग है। उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग (Uttar Pradesh Education Service Selection Commission) के अधिकारियों ने मौखिक रूप से यह स्पष्ट किया है कि भर्ती को रद्द करने की उनकी कोई योजना नहीं है और वे परीक्षा कराने का इरादा रखते हैं।

लेकिन यहाँ सबसे बड़ा सवाल भरोसे का है। जब पिछले तीन सालों में आयोग एक परीक्षा तक नहीं करा पाया और बार-बार तारीखें बदलने की खबरें आती रहीं, तो छात्र केवल मौखिक आश्वासनों पर कैसे विश्वास करें? यह स्थिति छात्रों और आयोग के बीच एक गहरे “भरोसे के संकट” को उजागर करती है, जहाँ बिना किसी लिखित और आधिकारिक सूचना के कोई भी बात मानने को तैयार नहीं है।

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4. चौथा सच: असली मुद्दा ‘रद्द’ या ‘परीक्षा’ नहीं, बल्कि ‘अनिश्चितता’ है

इस मामले की गहराई में जाने पर यह स्पष्ट होता है कि असली मुद्दा यह नहीं है कि भर्ती रद्द हो या परीक्षा कराई जाए। दोनों पक्षों के पास अपने-अपने मजबूत तर्क हैं। असली समस्या है अधिकारियों की तरफ से एक स्पष्ट और पारदर्शी टाइमलाइन का पूरी तरह से अभाव।

यह तीन साल की अंतहीन अनिश्चितता ही छात्रों को मानसिक तनाव की चरम सीमा तक ले गई है। जब छात्रों को यह नहीं पता होता कि परीक्षा कल होगी, छह महीने बाद होगी, या कभी नहीं होगी, तो वे गुटों में बंट जाते हैं और आंदोलन करने पर मजबूर हो जाते हैं। इस विवाद को खत्म करने का सबसे सीधा समाधान यह है कि आयोग तत्काल एक निश्चित परीक्षा तिथि की घोषणा करे और भर्ती पूरी करने के लिए एक पारदर्शी समय-सारणी जारी करे।

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निष्कर्ष: आगे का रास्ता क्या है?

आज प्रदेश के हज़ारों शिक्षक अभ्यर्थी एक दोराहे पर खड़े हैं, लेकिन यह गतिरोध स्वयं व्यवस्था की विफलता का परिणाम है। अंतिम निर्णय निस्संदेह सरकार और आयोग के हाथ में है, लेकिन जब तक आयोग अपनी ज़िम्मेदारी स्वीकार करते हुए एक स्पष्ट और आधिकारिक टाइमलाइन जारी नहीं करता, तब तक कोई भी समाधान संभव नहीं है।

जब तक आयोग एक स्पष्ट और आधिकारिक टाइमलाइन जारी नहीं करता, क्या प्रदेश के हज़ारों छात्रों का भविष्य अनिश्चितता के इस भंवर में फंसा रहेगा?


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