72825 शिक्षक भर्ती: सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से निकले 5 सबसे चौंकाने वाले और सकारात्मक पहलू

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72825 शिक्षक भर्ती: सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई से निकले 5 सबसे चौंकाने वाले और सकारात्मक पहलू

उत्तर प्रदेश की बुनियादी शिक्षा व्यवस्था में मील का पत्थर मानी जाने वाली 72825 शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थियों के लिए 25 फरवरी 2026 की तारीख किसी ऐतिहासिक विजय से कम नहीं रही। एक दशक से अधिक का लंबा कानूनी वनवास, मानसिक प्रताड़ना और अनिश्चितता के बाद, सुप्रीम कोर्ट की बेंच से जो स्वर निकले हैं, वे न केवल उत्साहजनक हैं बल्कि इस जटिल विवाद के ‘निर्णायक अंत’ की घोषणा करते प्रतीत होते हैं।

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72825 shikshak Bharti Latest News Today के व्यापक संदर्भ में यदि हम इस सुनवाई का विश्लेषण करें, तो यह स्पष्ट है कि न्यायपालिका अब तकनीकी पेचीदगियों के बजाय ‘मानवीय न्याय’ और ‘संवैधानिक समाधान’ को प्राथमिकता दे रही है। वरिष्ठ कानूनी पत्रकार के नजरिए से, इस सुनवाई के पाँच ऐसे पहलू उभरकर आए हैं जिन्होंने भर्ती की पूरी तस्वीर बदल दी है।

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1. “मैं इन उम्मीदवारों की रक्षा करने जा रहा हूँ” – न्यायपालिका का मानवीय संकल्प

सुनवाई के दौरान जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की पीठ का रुख बेहद संवेदनशील रहा। जब सरकार की ओर से कानूनी अड़चनें गिनाई जा रही थीं, तब जस्टिस करोल की एक टिप्पणी ने कोर्ट रूम के वातावरण को आशावाद से भर दिया। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में अभ्यर्थियों के भविष्य को सुरक्षित करने की बात कही।

“मैं इन कैंडिडेट्स को प्रोटेक्ट करने जा रहा हूँ” (I am going to protect these candidates)

कानूनी विश्लेषक इसे ‘न्यायिक सक्रियता’ (Judicial Activism) के एक उत्कृष्ट उदाहरण के रूप में देख रहे हैं। बेंच का यह संदेश स्पष्ट था: वह न्याय का दरवाजा बंद करने के लिए नहीं, बल्कि वर्षों से भटक रहे पात्र उम्मीदवारों के लिए एक नया ‘रास्ता बनाने’ के लिए बैठे हैं। यह टिप्पणी केवल एक वाक्य नहीं, बल्कि अभ्यर्थियों के प्रति शीर्ष अदालत का एक विधिक कवच है।

2. मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव स्तर पर समाधान की मांग: सरकार पर बढ़ा दबाव

इस सुनवाई का एक सबसे महत्वपूर्ण और औपचारिक पहलू यह रहा कि कोर्ट ने सीधे विभाग के अपर मुख्य सचिव (ACS), बेसिक शिक्षा से संवाद किया। सुनवाई के दौरान ACS की व्यक्तिगत उपस्थिति यह दर्शाती है कि कोर्ट अब इस मामले में उच्च स्तरीय जवाबदेही चाहता है।

राज्य सरकार ने 2023 के उस विवादित फैसले का हवाला दिया जिसमें B.Ed अभ्यर्थियों की पात्रता पर सवाल उठाए गए थे। हालांकि, कोर्ट ने सरकार के इस संकोच को दरकिनार करते हुए एक ‘Amicable Solution’ (सौहार्दपूर्ण समाधान) पेश करने का निर्देश दिया। बेंच ने स्पष्ट किया कि इस मुद्दे को सीधे मुख्यमंत्री और मुख्य सचिव के समक्ष रखा जाए। यह निर्देश सरकार पर एक भारी नैतिक और प्रशासनिक दबाव बनाता है कि वह 24 मार्च तक एक ठोस प्रस्ताव के साथ आए।

3. अतिरिक्त सीटों (Supernumerary Posts) का विकल्प और जिला आवंटन में बड़ी राहत

सुनवाई का सबसे चौंकाने वाला मोड़ तब आया जब कोर्ट ने सीटों की संख्या और नियुक्ति की प्रक्रिया पर व्यावहारिक समाधान सुझाया।

  • 10,000 अतिरिक्त सीटें: कोर्ट ने संज्ञान लिया कि यदि योग्य उम्मीदवारों की संख्या 17,000 है और उपलब्ध सीटें केवल 7,000 हैं, तो सरकार को पीछे नहीं हटना चाहिए। कोर्ट ने संकेत दिया कि सरकार 10,000 नई या ‘सुपरन्यूमरेरी’ (Supernumerary) सीटों की व्यवस्था कर सकती है ताकि किसी भी पात्र अभ्यर्थी का हक न छिने।
  • किसी भी जिले में नियुक्ति: एक बड़ी कानूनी बाधा को दूर करते हुए कोर्ट ने कहा कि नियुक्तियां “किसी भी जिले” (Any District) में दी जा सकती हैं। इससे उन अभ्यर्थियों को बड़ी राहत मिली है जो मूल आवेदन के आधार पर तकनीकी उलझनों में फंसे थे। अब जिला आवंटन की प्रक्रिया सरल और त्वरित हो सकेगी।

4. तकनीकी बाधाओं का अंत: D.El.Ed और छात्र-शिक्षक अनुपात पर स्पष्टता

शिक्षा नीति के विशेषज्ञ के रूप में, यह देखना सुखद है कि कोर्ट अब तकनीकी खामियों के आधार पर नियुक्तियों को रोकने के पक्ष में नहीं है। दो प्रमुख विवादों पर कोर्ट ने ऐतिहासिक लचीलापन दिखाया:

  • D.El.Ed की अनिवार्यता: कोर्ट ने कहा कि यदि किसी पात्र अभ्यर्थी के पास फिलहाल D.El.Ed की डिग्री नहीं है, तो उसे समय दिया जाना चाहिए ताकि वह सेवा में रहते हुए इसे पूर्ण कर सके। “समय दे दीजिए, डिग्री ले लेंगे” – जज साहब की यह टिप्पणी प्रक्रिया को समावेशी बनाती है।
  • शिक्षामित्रों का तर्क खारिज: सरकार ने जब छात्र-शिक्षक अनुपात का हवाला देते हुए शिक्षामित्रों को भी उसमें शामिल किया, तो कोर्ट ने इस दलील को सिरे से खारिज कर दिया। इससे साफ हो गया कि सरकार आंकड़ों की बाजीगरी से भर्ती को और अधिक लटका नहीं सकती।

5. नई नियुक्तियों (Fresh Appointments) का रोडमैप और “विंडो लॉक”

कोर्ट ने भविष्य की भर्ती प्रक्रिया के लिए कुछ कड़े लेकिन स्पष्ट नियम तय किए हैं, जो किसी भी नए विवाद की संभावना को समाप्त करते हैं:

  • नियुक्ति की प्रकृति: ये सभी ‘फ्रेश अपॉइंटमेंट’ होंगे। उम्मीदवारों को पिछली वरिष्ठता (Seniority) या बकाया वेतन (Arrears) का दावा करने का अधिकार नहीं होगा।
  • लिस्ट का प्रबंधन: 16,478 की लिस्ट और Google Form भरने वाले अभ्यर्थियों के अस्तित्व को पृथक रखा जाएगा, उन्हें मर्ज कर जटिलता नहीं बढ़ाई जाएगी।
  • विंडो लॉक (No Further Entry): कोर्ट ने “Window Lock” का सिद्धांत लागू कर दिया है, जिसका अर्थ है कि अब इस प्रक्रिया में कोई नई एंट्री संभव नहीं होगी। केवल वे ही लोग पात्र होंगे जो पहले से इस कानूनी प्रक्रिया का हिस्सा रहे हैं।

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कोर्ट की अंतिम चेतावनी: समाधान लाएं वरना आदेश (Mandamus) तैयार है

सुनवाई के समापन पर बेंच ने सरकार को एक कड़ी चेतावनी भी दी। कोर्ट ने कहा कि वे चाहते हैं कि सरकार स्वयं एक सौहार्दपूर्ण समाधान लेकर आए, लेकिन यदि 24 मार्च तक ऐसा नहीं होता है, तो सुप्रीम कोर्ट अपनी शक्तियों (Judicial Power) का प्रयोग करते हुए सीधा आदेश (Mandamus) पारित करेगा। यह दर्शाता है कि न्यायपालिका अब इस मुद्दे को और अधिक खींचने के मूड में नहीं है।

निष्कर्ष और भविष्य की राह

25 फरवरी की सुनवाई ने 72825 शिक्षक भर्ती के अभ्यर्थियों के संघर्ष को एक नई गरिमा प्रदान की है। अब सबकी निगाहें 24 मार्च 2026 की अगली सुनवाई पर हैं। इसे ‘होली के बाद के उपहार’ के रूप में देखा जा रहा है। सरकार के पास अब एक ही विकल्प है—एक सकारात्मक प्रस्ताव के साथ कोर्ट में उपस्थित होना।

वर्षों का धैर्य अब अपने फल की ओर बढ़ रहा है। राज्य सरकार को समझना होगा कि अब गेंद उसके पाले में है और सुप्रीम कोर्ट की नजरें सीधे शासन के शीर्ष स्तर पर हैं।

क्या आपको लगता है कि 24 मार्च को 72825 भर्ती के इस दशक पुराने संघर्ष का सुखद अंत होगा? अपनी राय कमेंट बॉक्स में साझा करें।


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