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AI समिट का शोर बनाम जमीनी हकीकत: क्या हम वाकई ग्लोबल लीडर हैं या सिर्फ एक ‘भोंपू’?

AI Summit के बड़े दावे, मीडिया हाइप और उसी दिन Sensex–Nifty की बड़ी गिरावट। क्या भारत वाकई Global AI Leader है या सिर्फ दिखावा?

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19 फरवरी की तारीख को याद कीजिए। दिल्ली में ‘एआई समिट’ का चमकदार महाकुंभ चल रहा था, हेडलाइंस भारत को ‘ग्लोबल पावर’ और ‘एआई लीडर’ घोषित कर रही थीं। लेकिन उसी दिन शेयर बाजार का पारा कुछ और ही कहानी बयां कर रहा था। सेंसेक्स 1400 अंक और निफ्टी करीब 400 अंक नीचे गिर गया। अगर विदेशी कंपनियों के निवेश के दावे इतने ही ठोस और परिवर्तनकारी थे, तो बाजार ने इस पर भरोसा करने के बजाय ‘बिकवाली’ का रास्ता क्यों चुना?

एक वरिष्ठ डिजिटल पत्रकार और विश्लेषक के तौर पर, यह विरोधाभास हमें मजबूर करता है कि हम अखबारों में परोसे जा रहे ‘चीनी के घोल’ (Hype) को हटाकर कड़वी हकीकत का विश्लेषण करें। क्या हम वाकई एआई की दौड़ में आगे हैं, या हम केवल नारों की एक नई फैक्ट्री लगा रहे हैं?

1. हेडलाइन मैनेजमेंट: जब मीडिया ‘भोंपू’ बन जाए

आजकल एआई सम्मेलन का कवरेज सूचना देने के बजाय ‘इमेज बिल्डिंग’ का टूल बन गया है। मीडिया गूगल के सुंदर पिचाई और ब्रिटेन के पूर्व प्रधानमंत्री ऋषि सुनक—जिनकी अपनी राजनीतिक साख दांव पर है—के बयानों को ऐसे पेश कर रहा है जैसे भारत रातों-रात दुनिया का नेतृत्व करने लगा हो।

  • भारतीय दिग्गजों पर चुप्पी: मीडिया विदेशी कंपनियों के निवेश का जश्न तो मना रहा है, लेकिन हमारे अपने घरेलू दिग्गजों—TCS, Infosys और HCL—का निवेश कितना है? रिलायंस ने अगले 7 साल में ₹10 लाख करोड़ के निवेश का दावा किया है, लेकिन क्या किसी ने इसकी क्रिटिकल समीक्षा की?
  • दिखावटी नवाचार का सच: सम्मेलन की चमक-धमक के बीच गलगोटिया यूनिवर्सिटी जैसे उदाहरण भी सामने आए, जहाँ एक चीनी एआई डॉग को अपना आविष्कार बताकर वाहवाही लूटने की कोशिश की गई। यह ‘हाइप’ की पराकाष्ठा है।
  • पत्रकारिता का पतन: मीडिया का काम कड़वे सवाल पूछना है, न कि केवल सरकारी कूटनीतिक बुद्धिमत्ता का गुणगान करना। रवीश कुमार ठीक ही कहते हैं: “मीडिया को परिपक्व होना चाहिए भोंपू नहीं।”

2. एक्रोनिम्स (Acronyms) की फैक्ट्री: MANAV से PUSH तक

प्रधानमंत्री की राजनीति में नारों और एक्रोनिम्स का अपना ही एक मायाजाल है। इस समिट में उन्होंने एक नया शब्द दिया—MANAV (Moral, Accountable, National, Accessible, Valid)। लेकिन इतिहास गवाह है कि नारों और धरातल के नतीजों में जमीन-आसमान का अंतर होता है।

  • नारों का गायब होना: सितंबर 2024 में अमेरिका में PUSH (Progressive, Unstoppable, Spiritual, Humanity, Prosperous) का नारा दिया गया, लेकिन डोनाल्ड ट्रंप के आते ही वह ‘पुष्प’ गायब हो गया और कांटे नजर आने लगे।
  • डबल AI और स्लोगन की बाढ़: आजकल भारत में एआई मॉडल से ज्यादा स्लोगन बन रहे हैं। ‘डबल AI’ (Artificial Intelligence + Aspirational India) और ‘डिजाइन एंड डेवलप इन इंडिया’ जैसे आकर्षक जुमले तो बहुत हैं, लेकिन 12 साल पहले के ‘स्मार्ट सिटी’ और ‘स्किल इंडिया’ जैसे नारों की विफलता आज भी हमारे सामने है।

3. डेटा का विरोधाभास: 20% उत्पादन बनाम 3% क्षमता

भारत को ‘ग्लोबल डेटा लीडर’ के रूप में पेश किया जा रहा है क्योंकि हम दुनिया का 20% डेटा जनरेट करते हैं। लेकिन एक तकनीकी विश्लेषक के तौर पर हमें यह समझना होगा कि डेटा जनरेट करना और उसे प्रोसेस करना दो अलग बातें हैं।

  • स्टोरेज का संकट: दुनिया की कुल डेटा स्टोरेज क्षमता में भारत की हिस्सेदारी मात्र 3% है।
  • कंज्यूमर बनाम क्रिएटर: जब तक हमारे पास अपने ‘फाउंडेशन मॉडल्स’ और डेटा सेंटर्स नहीं होंगे, हम दुनिया के लिए केवल कच्चे माल (डेटा) के आपूर्तिकर्ता बने रहेंगे, ‘ग्लोबल लीडर’ नहीं।

4. ऊर्जा और पर्यावरण: ग्रिड पर मंडराता खतरा

एआई और डेटा सेंटर्स बिजली और पानी के ‘राक्षस’ हैं। अमेरिका जैसे विकसित देश एआई के लिए बिजली उत्पादन बढ़ाने हेतु संघर्ष कर रहे हैं, तो भारत में क्या होगा?

  • ग्रिड की सीमाएं: भारतीय ग्रिड सिस्टम ने कभी भी उतना लोड नहीं संभाला है जितना एक बड़े एआई क्लस्टर को चाहिए।
  • महंगाई का खतरा: बिजली कंपनियां पहले से ही घाटे में हैं। अगर सारी प्राथमिकता डेटा सेंटर्स को दी गई, तो क्या आम जनता के लिए बिजली और महंगी हो जाएगी? मीडिया इन बुनियादी चुनौतियों (Data Center Challenges) पर खामोश है।

5. सब्सिडी का गणित और ‘मिट्टी’ की हकीकत

सेमीकंडक्टर के बिना एआई का सपना अधूरा है। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स का धोलेरा (गुजरात) प्रोजेक्ट चर्चा में है, लेकिन यहाँ ‘ढीली मिट्टी’ की समस्या के कारण प्रोजेक्ट में महीनों की देरी हुई।

  • सब्सिडी और राजनीतिक चंदा: टाटा की दो सेमीकंडक्टर यूनिट्स को ₹44,000 करोड़ की सब्सिडी मिलने से ठीक पहले टाटा समूह द्वारा भाजपा को ₹758 करोड़ का चंदा दिए जाने की खबर एक गंभीर ‘इनवेस्टिगेटिव पॉइंट’ है।
  • PLI योजना का फ्लॉप शो: सरकार की बहुप्रचारित पीएलआई (PLI) योजना का सच यह है कि बजट में आवंटित राशि का केवल 12% ही अब तक कंपनियों तक पहुँच पाया है। यानी घोषणाएं जितनी बड़ी हैं, भुगतान उतना ही सुस्त।

6. नौकरियों पर संकट और सर्विस मॉडल का पतन

सैम ऑल्टमैन (OpenAI) खुलेआम कह रहे हैं कि एआई से नौकरियां जाएंगी। लेकिन भारतीय मीडिया “सब ठीक है” के मोड में है।

  • Infosys का उदाहरण: बाजार का अविश्वास देखिए—जब इंफोसिस ने अपना स्वतंत्र एआई रोडमैप दिया, तो उसके शेयर गिर गए। लेकिन जैसे ही उसने अमेरिकी कंपनी Anthropic के साथ डील की, उसके शेयर 2% उछल गए।
  • निर्भरता: यह साफ दिखाता है कि दुनिया को भारतीय कंपनियों की अपनी एआई क्षमता पर भरोसा नहीं है; वे हमें आज भी केवल एक ‘सर्विस कंपनी’ या विदेशी मॉडल्स के ‘ग्राहक’ के रूप में देख रहे हैं।

निष्कर्ष: शादी का बुफे या ठोस भविष्य?

अर्थशास्त्री श्रुति राजगोपालन ने भारत के एआई विजन को ‘शादी के बुफे’ की तरह बताया है, जहाँ मेन इवेंट से लेकर साइड इवेंट तक सब कुछ एक साथ सजाया गया है, लेकिन गहराई की भारी कमी है। निवेशक आज भी भारत के जटिल टैक्स सिस्टम, सब्सिडी में देरी और राजनीतिक ‘ग्रिडलॉक’ को लेकर आशंकित हैं।

सवाल यह है कि क्या हम वाकई एआई की रेस में दौड़ रहे हैं, या हम केवल एक चमकदार मंच सजाकर दुनिया को यह दिखाने की कोशिश कर रहे हैं कि हम रेस का हिस्सा हैं? Investment in AI के नाम पर जब तक हम बुनियादी ढांचे, शिक्षा और निष्पक्ष नीतियों पर काम नहीं करेंगे, तब तक हम ‘ग्लोबल लीडर’ नहीं, बल्कि सिर्फ एक बड़े ‘कंज्यूमर’ बने रहेंगे।

मीडिया हमें रात में धूप का चश्मा पहनाकर भ्रमित कर सकता है, लेकिन हकीकत को हमेशा के लिए नहीं छुपा सकता।


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